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संतोषी माता की व्रत कथा और संपूर्ण पुजन विधि आरती सहित

संतोषी माता की व्रत कथा पूजन विधि और आरती


संतोषी माता की व्रत कथा

संतोषी माता की व्रत कथा के बारे में जानकारी


संतोषी माता हिंदू धर्म में संतोष सुख और शांति और वैभव की माता के रूप में पूजी जाती है। धार्मिक मान्यताओं क्या अनुसार माता संतोषी भगवान श्री गणेश की पुत्री है। संतोष हमारे जीवन में बहुत जरूरी है। संतोष ना हो तो इंसान मानसिक और शारीरिक तौर पर बेहद कमजोर हो जाता है। संतोषी माता की व्रत कथा सुनने से हमारी  सभी  इच्छाएं पूर्ण होती है तथा संतोषी माता की व्रत कथा , पूजन तथा संपूर्ण उद्यापन करने से हमारे जीवन की सभी समस्याएं दूर हो जाती है। संतोषी मां में संतोष दिला हमारे जीवन में खुशियों का प्रवाह करती है। माता संतोषी का व्रत और पूजन करने से धरम विवाह, संतान आदि भौतिक सुखों में वृद्धि होती है। यह व्रत शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार से शुरू किया जाता है। तो आइए सुनते हैं संतोषी माता की व्रत कथा, विधि, और आरती।

संतोषी माता की व्रत कथा


एक बुढ़िया थी जिसके साथ पुत्र थे। जिनमें से 6 पुत्र कमाते थे तथा एक पुत्र नहीं कमाता था। वह बुढ़िया उन छह भाईयो को अच्छी रसोई बनाकर खिलाती थी। और उस सातवे पुत्र को बच्चा हुआ खाना दे देती थी। परंतु वह भोला था, अतः मन में कुछ भी विचार नहीं करता था। (आप पढ़ रहे है संतोषी माता की व्रत कथा)

एक दिन वह अपनी पत्नी से बोला "की माता को मुझसे कितना प्रेम है उसने कहा "वह तुम्हें सभी की जूठन खिलाती है फिर भी तुम ऐसा कहते हो चाहे तो तुम समय आने पर देख सकते हो"।एक दिन बोहोत बड़ा त्योहार आया।बुढ़िया ने 7 प्रकार के भोजन और चूरमे के लड्डू बनाए। सातवां लड़का यह बात जांचने के लिए सिर दुखने का बहाना करके कंबल ओढ़ के सो गया और देखने लगा, की मां ने उन्हें बहुत अच्छे आसनों पर बिठाया और 7 प्रकार के भोजन व लड्डू परोसे। वह उन्हें बड़े प्रेम से खिलाने लगी। जब सभी उठ गए तो मां ने उन सभी भाइयों की जुठन इकट्ठा की और उससे एक लड्डू बनाया। फिर वह सारे लड़के से बोली "कि बेटा रोटी खा ले। वह बोला मां में भोजन नहीं करूंगा। में तो परदेस जा रहा हूं। मा ने बोला कल जाता है तो आज ही चला जा"। वह घर से निकल गया।(आप पढ़ रहे है संतोषी माता की व्रत कथा)

 चलते समय उसे अपनी पत्नी की याद आई। जो गौशाला में कंडे थाप रही थी। वह बोला "हम विदेश को जा रहे हैं।आएंगे कछू काल तुम रहियो संतोष सेधरम अपनो पाल"। इस पर उसकी पत्नी बोली" जाओ पिया आनंद से, हमारी सोच हटाए। राम भरोसे हम रहें, ईश्वर तुम्हें सहाय।। देउ निशानी आपनी, देख धरु मे धीर, सुधि हमारी ना बिसारियो, रखियो मन गंभीर।।(आप पढ़ रहे है संतोषी माता की व्रत कथा)


 इस पर वह लड़का बोला मेरे पास कुछ नहीं है यह अंगूठी है सो, ले और मुझे भी कोई अपनी निशानी दे दे। वह बोली मेरे पास क्या है। यह गोबर भरे हाथ है। यह कहकर उसने उसकी पीठ पर गोबर भरे हाथ की थाप मार दी। वह लड़का चल दिया।  ऐसा कहते हैं किसी कारण से विवाह में पत्नी पति की पीठ पर हाथ का छापा मारती है।(आप पढ़ रहे है संतोषी माता की व्रत कथा)


चलते समय वह दूर देश में पहुंचा। वह एक व्यापारी की दुकान में जाकर बोला भाई मुझे नौकरी पर रख लो व्यापारी को नौकर की जरूरत थी। इसलिए वह बोला कि तुम रह जाओ तुम्हारा काम देखकर तनख्वाह देंगे वह सुबह 7:00 बजे से रात के 12:00 बजे तक नौकरी करने लगा। थोड़े ही दिनों में सारा लेन-देन और हिसाब किताब करने लगा। सेठ के साथ आठ नौ कर चक्कर खाने लगे। सेठ ने उसे दो-तीन महीने में ही अपने आधे मुनाफे का हिस्सेदार बना दिया। 12 वर्ष में वह नामी सेठ बन गया। और उसका मालिक उसके भरोसे काम छोड़कर कहीं बाहर चला गया। उधर उसकी औरत को उसकी सास और जेठानी या बड़ा कष्ट देने लगी । वह उसे लकड़ी लेने के लिए जंगल में भेज दी थी। भूसे की रोटी देती थी। फूटे नारियल में पानी दे दी थी।(आप पढ़ रहे है संतोषी माता की व्रत कथा)
 एक दिन जब वह लकड़ी लेने जा रही थी दो रास्ते में उसे कई औरतों को व्रत करते हुए देखा। वह पूछने लगी बहनों यह किस का व्रत है, कैसे करते हैं, और इससे क्या फल मिलता है। तो एक स्त्री बोली "यह संतोषी माता का व्रत है इसके करने से मनोवांछित फल मिलता है। इसे गरीबी, मन की चिंताएं, क्लेश, रोग सभी नष्ट होते हैं। और संतान सुख, धन, प्रसन्नता, शांति ,मनपसंद वर मिलते हैं। और बाहर गए हुए पति के दर्शन मिलते हैं। उसने उस दिन उसे व्रत करने की विधि बता दी। रास्ते में उसने सभी लकड़ियां बेच दी, तथा गुड़ और चना ले लिया।(आप पढ़ रहे है संतोषी माता की व्रत कथा)

 उसने व्रत करने की तैयारी की। उसने सामने एक मंदिर देखा तो पूछने लगी यह मंदिर किसका है। वह कहने लगी यह संतोषी माता का मंदिर है। वह मंदिर में गई और और माता के चरणों में लोटने लगी। वह दुखी होकर विनती करने लगी "मां मैं अज्ञानी हूं मैं बहुत दुखी हूं मैं तुम्हारी शरण में हूं मेरा दुख दूर करो। माता को दया आ गई। यह शुक्रवार को उसके पति का पत्र आया। और अगले शुक्रवार को पति का भेजा हुआ धन मिला। अब तो जेठ जेठानी और सास नाक सी कोड कर कहने लगे कि अब यह बुलाने पर भी नहीं बोलेगी।
(आप पढ़ रहे है संतोषी माता की व्रत कथा)

वह बोली पत्थर और धन आ गए तो सभी को अच्छा है उसकी आंखों में आंसू आ गए। वह मंदिर में गई और माता के चरणों में गिरकर बोली "मां मैंने तुमसे पैसा कब मांगा था। मुझे तो अपना सुहाग चाहिए। मैं तो अपने स्वामी के दर्शन और सेवा मांगती हूं"।(आप पढ़ रहे है संतोषी माता की व्रत कथा)

तब माता ने खुश होकर कहा "जा बेटी तेरा पति आवेला"। वह बड़ी प्रसन्नता से गर गई और घर का कामकाज करने लगी।  उधर संतोषी माता ने उसके पति को स्वप्न में घर जाने और पत्नी की याद दिलाई। उसने कहा मां मैं कैसे जाऊं परदेस की बात है लेन-देन का कोई हिसाब नहीं है। मैंने कहा मेरी बात मान सवेरे नहा धोकर मेरा नाम लेकर घी का दीपक जलाकर दंडवत करके दुकान पर बैठना देखते-देखते सारा लेन-देन साफ हो जाएगा। धन का ढेर लग जाएगा।
सवेरे उसने अपनी सपने की बात सभी से कहीं तो सब दिल्लगी उड़ाने लगे। वह कहने लगे कहीं सपने भी सत्य होते हैं? पर एक बुड्ढे ने कहा भाई जैसे माता ने कहा है वैसे करने में क्या डर है। उसने माता को दंडवत करके घी का दीपक जलाया।
और दुकान पर जाकर बैठ गया। थोड़ी ही देर में सारा लेन-देन साफ हो गया। सारा माल बिक गया और धन का ढेर लग गया वो खुश हुआ। और घर के लिए गहने और सामान वगैरह खरीदने लगा। वह जल्दी घर को रवाना हो गया। उधर बिचारी उसकी पत्नी रोज लकड़िया लेने जाती। और रोज संतोषी माता की सेवा करती थी।(आप पढ़ रहे है संतोषी माता की व्रत कथा)
उसने माता से पूछा हे मा यह धूल कैसे उड़ रही है। माता ने कहा तेरा पति आ रहा है। तू लकड़ियों के तीन बोझ बना ले। एक नदी के किनारे रख, एक यहां रख, और तीसरा यह अपने सिर पर रख ले। तेरे पति के दिल में उस लकड़ी के गड्ढे को देखकर मोह पैदा होगा। जब वह वहां रुकेगा और नाश्ता पानी करके घर आएगा तब तो आवाज लगाना सासूजी लकड़ियों का गट्ठर लो भूसे की रोटी दो और नारियल के खोपड़े में पानी दो आज मेहमान कौन आया है।(आप पढ़ रहे है संतोषी माता की व्रत कथा)

 इसने मां के चरण छुए और कहे अनुसार सारा कार्य किया। वह तीसरा गट्ठर देखकर घर गई और चौक में डाल कर कहने लगी "सासूजी लकड़ियों का गट्ठर लो भूसे की रोटी दो नारियल के कपड़े में पानी दो आज मेहमान कौन आया है। यह सुनकर सास बाहर आकर कपट प्रवचनों से उसके दी हुए कष्टों को बुलाने के लिए कहने लगी "बेटी तेरा पति आया है मीठा भात और भोजन कर, महंगे कपड़े पहन। अपनी मां के एसे वचन सुनकर उसका पति बाहर आया और अपनी पत्नी के हाथ में अंगूठी देखकर व्याकुल हो उठा। उसने पूछा यह कौन है?  मां ने कहा यह तेरी बहू है। आज 12 बरस हो गए यह दिन भर घूमती फिरती है।(आप पढ़ रहे है संतोषी माता की व्रत कथा)
कामकाज करती नहीं है। तुझे देखकर नखरे करती है। वह बोला ठीक है मैंने तुझे और इसे देख लिया है। अब मुझे दूसरे घर की चाबी दे दो, मैं उसमें रहूंगा। मां ने कहा ठीक है जैसी तेरी मर्जी और उससे चाबी का गुच्छा पटक दिया। उसने अपना सामान तीसरी मंजिल के ऊपर के कमरे में रख दिया।

 1 दिन में वह राजा के समान ठाटबाट वाले बन गए इतने में अगला शुक्रवार आया। बहू ने अपने पति से कहा मुझे संतोषी माता के व्रत का उद्यापन करना है। वह बोला बहुत अच्छा खुशी से कर ले।वह जल्दी ही उद्यापन की तैयारी करने लगी उसने जेठ के लड़कों को जीमने के लिए कहा उन्होंने मान लिया।(आप पढ़ रहे है संतोषी माता की व्रत कथा)

 पीछे से जेठानी उन्हें अपने बच्चों को सिखा दिया तुम खटाई मांगना जिससे उसका उद्यापन पूरा ना हो। लड़कों ने जिमने पर खटाई मांगी।  बहू कहने लगे भाई खटाई किसी को नहीं दी जाएगी यह तो संतोषी माता का प्रसाद है। लड़के खड़े हो गए और बोले पैसा लाओ वह बोली कुछ ना समझ सके उनका क्या भेद है उसने पैसे दे दिए और वे इमली की खटाई मंगा कर खाने लगे। इस पर संतोषी माता ने उन पर क्रोध किया। राजा उसके पति को पकड़ के ले गए।(आप पढ़ रहे है संतोषी माता की व्रत कथा)

 वह बिचारी बहुत बहुत दुखी हुई और रोती हुई माताजी के मंदिर को गई और उनके चरणों में गिर कर कहने लगी। है माता यह क्या किया हंसा कर अब तो मुझे क्यों रुलाने लगी। माता बोली पुत्री मुझे दुख है कि तुमने अभीमान करके मेरा व्रत तोड़ा है। और इतनी जल्दी सब बातें भुला दी। वह कहने लगी माता मेरा कोई अपराध नहीं है, मुझे तो लड़कों ने भूल में छल दिया। मैंने भूल में ही उन्हें पैसे दे दिए मां मुझे क्षमा करो। मैं दुबारा तुम्हारा उद्यापन करुंगी माता बोली जा तेरा पति से रास्ते में आता हुआ ही मिलेगा।(आप पढ़ रहे है संतोषी माता की व्रत कथा)
 उसे रास्ते में उसका पति मिला। उसके पूछने पर वह बोला राजा ने मुझे बुलाया था। मैं उससे मिलने गया था वे फिर घर चले गए कुछ ही दिन बाद फिर शुक्रवार आया। वह दुबारा पति की आज्ञा से उद्यापन करने लगी। उसने फिर जेठ के लड़कों को बुलावा दिया। जेठानी ने फिर वही बात सिखा दी। लड़के भोजन के बाद पर खटाई मांगने लगे उसने कहा कटाई कुछ भी नहीं मिलेगी आना हो तो आओ यह कहकर वह ब्राह्मणों के लड़कों को लाकर भोजन कराने लगी। उसके बाद उसने उसने उन्हें दक्षिणा दी संतोषी माता उस पर बेहद खुश हुई ।(आप पढ़ रहे है संतोषी माता की व्रत कथा)

माता की कृपा से नौवें मास में उसके एक चंद्रमा के समान सुंदर पुत्र हुआ। अपने पुत्र को लेकर वे रोजाना मंदिर जाने लगी। 1 दिन संतोषी माता ने सोचा कि यह रोज यहां आती है आज  में इसके घर चलूंगी। इसका सासरा देखने यह सोचकर उसने एक भयानक रूप बनाया गुड़ व चने से सना मुख ऊपर को सूंड के समान होठ जिन पर मक्खियां भिन्न-भिन्न आ रही थी।(आप पढ़ रहे है संतोषी माता की व्रत कथा)

 इसी सूरत में वह उसके घर गई।डेली में पांव रखते ही उसकी सास बोली देखो कोई डाकिन आ रही है इसे भगाओ। नहीं तो किसी को खा जाएगी। लड़के भागकर खिड़की बंद करने लगे साथ में लड़के की बहू खिड़की से देख रही थी वह वहीं से चिल्लाने लगी आज मेरी माता मेरे ही घराई है। यह कहकर उसने बच्चे को दूध पीने से हटाया, इतने में सास बोली पगली किसे देखकर उतावली हुई है जो अपने बच्चे को ही पटक दिया है। इतने में संतोषी माता के प्रताप से वहां लड़के ही लड़के नजर आने लगे।बहु बोली "सासूजी मैं जिस का व्रत करती हूं यह तो वही संतोषी माता है यह कहकर उसने सारी खिड़कियां खोल दी।(आप पढ़ रहे है संतोषी माता की व्रत कथा)
 सब ने संतोषी माता के चरण पकड़ लिए और विनती करके कहने लगी हे माता हम मूर्ख हैं अज्ञानी हैं पापिनी है तुम्हारे व्रत की विधि हम नहीं जानते तुम्हारा व्रत भंग कर हमने बहुत बड़ा अपराध किया है हे जगत माता आप हमारा अपराध क्षमा करें इस पर माता खुश हुई जिस प्रकार संतोषी माता ने बहु को फल दिया वैसा ही फल सब माताओं को दें। तो आइए, संतोषी माता की व्रत कथा सुनने के बाद अब हम संतोषी माता की पूजन विधि सुनते हैं।(आप पढ़ रहे है संतोषी माता की व्रत कथा)

संतोषी माता व्रत कथा की पूजन विधि


सुख सौभाग्य की कामना से माता संतोषी की 16 शुक्रवार तक व्रत किए जाने का विधान है। सूर्योदय से पहले उठकर घर की सफाई इत्यादि पूर्ण कर ले। स्नानादि के बाद घर में किसी सुंदर व पवित्र जगह पर माता संतोषी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। माता संतोषी के सम्मुख एक कलश जल भरकर रखें कलश के ऊपर है कटोरा भर के गुण व चना रखें।
(आप पढ़ रहे हैं संतोषी माता व्रत कथा की पूजन विधि)

 माता के समक्ष एक घी का दीपक जलाएं। माता को फूल सुगंधित गंध, नारियल, लाल वस्त्र या चुनरी अर्पित करें। माता संतोषी को गुड व चने का भोग लगाएं ।संतोषी माता की जय बोल कर माता की कथा आरंभ करें। व्रत करने वाले को श्रद्धा और प्रेम से व्रत करना चाहिए। और हां एक अवश्य बात इस दिन व्रत करने वाली स्त्री पुरुष को ना ही खट्टी चीजें हाथ लगानी चाहिए। और ना ही खानी चाहिए। (आप पढ़ रहे हैं संतोषी माता व्रत कथा की पूजन विधि)

संतोषी माता की आरती

ओम जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
 अपने सेवक जन की, अपने सेवक जन की, सुख संपति दाता।। 
ओम जय संतोषी माता ......

ओम जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता। अपने सेवक जन की, सुख संपति दाता ।।
ओम जय संतोषी माता........

सुंदर चीर सुनहरी, मां धरण कीन्हों।
 हीरा पन्ना दमके, हीरा पन्ना दमके, तन शृंगार किनहो।।
 ओम जय संतोषी माता............

 ओम जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।। अपने सेवक जन की, सुख संपति दाता।। 
ओम जय संतोषी माता.......
 गेरू लाल छटा छबि, बदन कमल सोहे ।
मंद हसत करुणामई, त्रिभुवन मन मोहे।।
 ओम जय संतोषी माता.......
 ओम जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता ।
अपने सेवक जन की, अपने सेवक जन की सुख संपति दाता।। 
ओम जय संतोषी माता........
 घोड़ा और चना परम प्रिय, तामे संतोष कियो ।
 संतोषी कहलाई, भक्तों को वैभव दियो ।।
ओम जय संतोषी माता.......
 ओम जय संतोषी माता मैया जय संतोषी माता।
 अपने सेवक जन की अपने सेवक जन की सुख संपति दाता।।
 ओम जय संतोषी माता .......
शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही।
 भक्त मंडली आए तथा सुन्नत मोहि ।।
ओम जय संतोषी माता ......
ओम जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन की अपने सेवक जन की सुख संपति दाता।।
 ओम जय संतोषी माता....
 मंदिर जगमग ज्योति, मंगल ध्वनि छाई।
 बिनय अरे हम सेवक, चरनन सिर नाई ।।
ओम जय संतोषी माता........
 ओम जय संतोषी माता मैया जय संतोषी माता।
 अपने सेवक जन की, सुख संपति दाता।।
 ओम जय संतोषी माता......
 भक्ति भाव माई पूजा, अंगीकृत कीजै ।
जो मन बसाई, हमारे जो मन बसे हमारे इच्छित फल दीजिए।।
 ओम जय संतोषी माता.......
 ओम जय संतोषी माता मैया जय संतोषी माता ।
अपने सेवक जान की,सुख संपति दाता ।।
ओम जय संतोषी माता ......
दुखी दर्द भरी रोगी संकट मुक्त किए, तूने संकट मुक्त किए। 
बहु धन धान्य भरे घर, सुख सौभाग्य दिए।।
 ओम जय संतोषी माता.......
 ओम जय संतोषी माता मैया जय संतोषी माता अपने सेवक जन की सुख संपति दाता ओम जय संतोषी माता।
 ध्यान धरे जन तेरो, मन वांछित फल पायो।
पूजा कथा श्रवण कर, पूजा कथा श्रवण कर घर आनंद आयो।। 
ओम जय संतोषी माता.......
 ओम जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता। अपने सेवक जन की अपने सेवक जन की सुख संपति दाता।।ओम जय संतोषी माता।
 शरण गहे की लज्जा, रखियो जगदंबे ।
संकट तू ही निवारे संकट तू ही निवारे दयामई अंबे।।
 ओम जय संतोषी माता........
 ओम जय संतोषी माता मैया जय संतोषी माता ।अपने सेवक जन की अपने सेवक जन की सुख संपति दाता।।
 मैया जय संतोषी माता
संतोषी माता की आरती, जो कोई जन गावे।
 रिद्धि सिद्धि सुख संपति, जी भर के पावे।।
ओम जय संतोषी माता ........
ओम जय संतोषी माता मैया जय संतोषी माता ।
अपने सेवक जन की सुख संपति दाता ओम जय संतोषी माता।


दोस्तों आपने संतोषी माता की व्रत कथा का पूरा आनंद लिया और हमें उम्मीद है कि हमारी पूजन विधि और संतोषी माता की आरती से आपको बहुत आनंद आया होगा हम आशा करते हैं कि मां संतोषी आपको सुख वैभव धन धन संतान सभी भौतिक संसाधनों से पूरित करें यदि पसंद आया हो तो कमेंट बॉक्स में जय संतोषी माता जरूर लिखें।

धन वृद्धि के लिए पढ़े गणेश जी की कहानी(ganesh ji ki kahani)

 धन वृद्धि के लिए बड़े गणेश जी की कहानी(ganesh ji ki kahani)

गणेश चौथ व्रत कथा

दोस्तों आपने तो सुना ही होगा कि हर शुभ कार्य से पहले गणेश जी को याद किया जाता है। गणेश जी विघ्नहर्ता कहलाते हैं, इसीलिए हर कार्य की शुरुआत में इन्हें याद किया जाता है। इनके व्रत करने से आपको अपार धन संपदा प्राप्त होती है तथा गणेश जी की कहानी(ganesh ji ki kahani) सुनकर आप अपने आप को उनके एक नए भक्त के रूप में बदल सकते हैं। गणेश जी की कहानी(ganesh ji ki kahani) सुनने से बड़े-बड़े लोगों ने अपने व्यवसाय में वृद्धि की है ।तथा गणेश जी की कहानी सुनने से आपके घर में भी सुख शांति का वातावरण बना रहता है तो आइए सुनते हैं गणेश जी की कहानी(ganesh ji ki kahani)....


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गणेश जी की पहली कहानी(ganesh ji ki kahani)


Ganesh ji ki kahani

1. विनायक चतुर्थी की व्रत कथा (गणेश चौथ की कहानी)


एक समय की बात है, किसी गांव में एक विष्णु शर्मा नाम के ब्राम्हण रहते थे। वह वेदों के ज्ञाता थे और उनके साथ पुत्र थे, जिनमें से 6 पुत्र संपन्न थे। लेकिन एक पुत्र गरीब था। उनके सभी बेटे अलग-अलग रहते थे।
 विष्णु शर्मा अपने हर एक पुत्र के घर एक एक दिन भोजन करते थे। धीरे धीरे वह वृद्ध होकर दुर्बल हो गए वह अपनी पुत्रवधू द्वारा अपमानित होकर रोते रहते थे। एक बार विष्णु शर्मा ने गणेश चौथ का व्रत रखा। और अपने सबसे बड़ी बहू के घर पहुंचे और बोला "बहू मैंने आज गणेश चौथ का व्रत किया है तुम पूजा का सामान इकट्ठा कर दो भगवान गणेश खुश होकर तुम पर कृपा करेंगे" ।

यह सुनकर बहु कठोर वाणी में बोली "पिताजी मुझे तो घर के कार्यों से ही फुर्सत नहीं है मेरे पास इन फिजूल के कामों के लिए समय नहीं है आप तो हमेशा कुछ ना कुछ काम बताते रहते हो मैं नहीं जानती आप के गणेश जी को"।

 सबसे बड़ी बहू से डांट सुनकर विष्णु शर्मा अपनी सभी बहू के घर गए, परंतु सभी ने उन्हें डांट कर भगा दिया। वह बहुत दुखी हुए और अंत में अपनी छोटी बहू के घर गए।

 छोटी बहू के घर भी वे समझाते हुए बोले "बहुरानी सब बहुओं ने तो मुझे डांट कर घर से निकाल दिया अब मैं कहां जाऊं तुम्हारे पास तो मेरे व्रत की सामग्री लाने के भी पैसे नहीं है"।

 बहू बोली "ससुर जी आप परेशान ना हो और अपनी इच्छा पूर्वक व्रत करें। आपके साथ में भी व्रत करूंगी"। ऐसा कहकर छोटी बहू पड़ोसन से व्रत की सामग्री मांगने गई।उसने अपने ससुर के साथ पूजन किया। पूजन के बाद खाने की कमी से खुद भूखा रहकर ससुर को खाना खिलाया। और खुद भूखी ही सो गई। आधी रात के बाद ससुर को उल्टियां होने लगी। वो रोने लगी बोली "पिताजी मेरे बनाए हुए खाने से आपको उल्टियां होने लगी"। और वह सारी रात अपने ससुर के पास बैठी रही।

इस प्रकार उसका व्रत के साथ-साथ गणेश चौथ का जागरण भी हो गया। सुबह उठकर उसने देखा कि उसका सारा घर हीरे मोतियों से जगमग आ रहा है। अपने ससुर से बोली "पिताजी इतने हीरे मोती मेरे घर में कहां से आए"। तब ब्राह्मण विष्णु शर्मा बोले "बहु यह सब तो तुम्हारी भक्ति का फल है जिससे भगवान गणेश प्रसन्न हो गए हैं और उस व्रत के फल स्वरुप तुम्हें इतना धन मिला है"।

 बहू बोली पिता जी आपकी कृपा से गणेश जी मुझ पर प्रसन्न हुए हैं और मुझे अपार धन संपत्ति प्राप्त हुई है छोटी बहू के घर में इतनी धन-संपत्ति देखकर विष्णु शर्मा के सभी बेटे और बहू में वहां आ गए और क्रोधित होकर बोले "बुड्ढे ने अपना सारा  जमा किया हुआ धन सबसे छोटे बेटे को दे दिया है"।

तब विष्णु शर्मा बोले इसमें मेरी कोई कृपा नहीं है छोटी बहू के गणेश चौथ का व्रत करने से भगवान गणेश ने प्रसन्न होकर यह संपत्ति उसे प्रदान करी है मैंने पहले तुम सभी बहू के घर पर जाकर यह व्रत करने को कहा था। परंतु तुमने मेरी एक ना सुनी छोटी बहू ने मांग कर पूजा की सामग्री एकत्रित करें यह व्रत करा और इसकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर गणेश जी ने इसे अपार संपत्ति प्रदान करी है ।

2. गणेश जी की दूसरी कहानी



एक गांव में एक वृद्धा रहती थी। उसकी बहू थोड़ी सी पागल जैसी रहती थी। उसे भूख बिल्कुल सहन नहीं होती थी, वह रोज सुबह उठकर पहले खाना खाती थी, फिर दूसरे काम करती थी।(आप पढ़ रहे हैं गणेश जी की कहानी)

 एक दिन उनके यहां पूजा होनी थी, और पूजा के लिए खाना बनाना था, तो वृद्धा ने सोचा कि यह तो सुबह उठकर सबसे पहले खाऊं खाऊं करेगी और सारा खाना जूठा कर देगी। तो वृद्धा ने एक उपाय सोचा उसने पानी के मटके के नीचे एक छेद कर दिया और बहुत से कहा कि आज पूजा है "तू सुबह से खाऊं खाऊं मत करजे"।(आप पढ़ रहे हैं गणेश जी की कहानी)


"तू पहले पानी भर ला फिर कुछ खा पी लीजिए" बहू ने सास से कहा कि ठीक है मां और वह पानी भरने के लिए चली गई। बहु पानी भरने कुए पर आई तो उसने वहां पर सबसे पहले अपने साड़ी में बंधा हुआ आटा निकाला, फिर पनघट पर उसे गूंथ लिया और उसकी बाटिया बना ली।(आप पढ़ रहे हैं गणेश जी की कहानी)

 वहीं पास में शमशान था वहां एक मुर्दा जलाया गया था। तो उसकी आंच में उसने वह बाटिया सेक ली। और पास में ही एक गणेश जी का मंदिर था। मंदिर में किसी ने गणेश जी को चोला चढ़ाया था, तो गणेश जी की तोंद में घी लगा हुआ था। उसने उससे बाटिया चोपढ़कर एक बाटीका भोग गणेश जी के लगाकर, उसने वह बाटिया खाली। (आप पढ़ रहे हैं गणेश जी की कहानी)


 उसके बाद वह आराम से अपने घर चली गई। इधर गणेश जी ने क्रोधित होते हुए नाक पर उंगली चढ़ाली। फिर उसके बाद कोई उधर से निकला तो उसने देखा कि गणेश जी ने नाक पर उंगली चढ़ा रखी है। तो उसने गांव में जाकर सबसे कह दिया कि गणेश जी ने नाक पर उंगली चढ़ा ली, अब गणेश जी की नाक पर से उंगली उतारने के लिए सब प्रयास करने लगे। कोई गणेश जी के पाठ करने लग गया, कोई हवन कर रहा है ताकि गणेश जी की नाक पर से उंगली हटा ले, पर गणेश जी ने नाक पर से उंगली नहीं हटाई। (आप पढ़ रहे हैं गणेश जी की कहानी)


अब यह बात राजा तक पहुंच गई। राजा ने बड़े-बड़े पंडित और ज्योतिष बुलवाएं, पर वह भी गणेश जी की नाक से उंगली नहीं हटा पाए। अब राजा ने पूरे राज्य में मुनादी करवा दी कि जो भी गणेश जी की नाक पर से उंगली हटाएगा उसे 5 गांव की जागीर दे दी जाएगी। अब राज्य में सभी लोग अपनी अपनी तरफ से प्रयास करने लगे पर गणेश जी ने नाक से उंगली नहीं हटाई।(आप पढ़ रहे हैं गणेश जी की कहानी)


 सब थक हार गए ।आखिर में डोकरी की बहू बोली, की मां साहब आप कहो तो मैं गणेश जी की नाक से उंगली हटा सकती हूं। तो वृद्धा हंसने लगी कि बड़े-बड़े पंडित और ज्योतिष गणेश जी की नाक से उंगली नहीं हटा पाए, यह कैसे हटा देगी परंतु हो सकता है कि ऐसा हो जाए। (आप पढ़ रहे हैं गणेश जी की कहानी)

 तभी एक आदमी  ने कहा कि "एक बार इसे भी मौका दो। इसे भी प्रयास कर लेने दो। हो सकता है कि यह गणेश जी की नाक पर से उंगली हटा दे"। "बहू ने कहा पर मेरी एक शर्त है कि मेरे घर से गणेश जी के मंदिर तक एक बड़ा पर्दा लगाया जाए"। तो लोगों ने कहा ठीक है और घर से मंदिर तक पर्दा लगवा दिया।
(आप पढ़ रहे हैं गणेश जी की कहानी)


 अब बहू ने अपने घागरे (पेटीकोट) में  धोवना (कपड़े धोने का हथियार) छिपाकर मंदिर गई। मंदिर में ढोवना निकालकर गणेश जी से बोली "कारे कारे गनेश्या  मारा गर सू आटो लाई घर से पनघट पर आटो ओसन के उनिकी बाटिया बनाई, मर्या मुर्दा की आग में सेकी, थारी तोंद में से जरा सो घी ले लियो तो तूने नाक पर उँगली चढ़ा ली।नाक पे से ऊँगली हटा रियो की नई,नही तो दु एक धोवना री अभी था टुकड़ा टुकड़ा हो जाएगा"।(आप पढ़ रहे हैं गणेश जी की कहानी)


 बहू की बात सुनकर गणेश जी डर गए उन्होंने सोचा कि या बावली सही में मार देगी तो कई करूंगा। अनी को कई भरोसो और गणेश जी ने फट से नाक पर से उंगली हटा ली ।पूरेगां व में डोकरी की बहू की जय जयकार होने लगी कि डोकरी की बहू ने गणेश जी की नाक से उंगली हटवा दी। राजा ने अपने आदेश अनुसार 5 गांव जागीर में दिए।(आप पढ़ रहे हैं गणेश जी की कहानी)


 हे गणेश जी महाराज जैसे उस डोकरी की बहू के टूटे वैसे सबके टूट जो कथा अधूरी हो तो पूरी करे जो और पूरी हो तो मान कर जो

लक्ष्मी जी की आरती( lakshmi ji ki aarti)जो दे आपको कई गुना धन समृद्धि

 

लक्ष्मी जी की आरती(lakshmi ji ki aarti)जो दे आपको कई गुना धन समृद्धि

Lakshmi ji ki aarti

दोस्तों हर कोई अपार धन समृद्धि पाना चाहता है हर इंसान को चाहत है कि वह बहुत ज्यादा धनवान हो परंतु हर किसी का सपना सच नहीं होता।हर कोई अपने बिजी शेड्यूल के कारण लक्ष्मी जी की आरती(lakshmi ji ki aarti) नहीं कर पाता एवं हर कोई अपने मन से भगवान की आराधना करने में असक्षम होता है। यदि आप धन समृद्धि पाना चाहते हैं तथा बहुत धनवान होना चाहते हैं और लक्ष्मी जी की आरती(lakshmi ji ki aarti) करना चाहते हैं, तो आप रोजाना सुबह सुबह उठकर मां लक्ष्मी की आराधना करें और लक्ष्मी जी की आरती(lakshmi ji ki aarti) रोजाना गाए, इससे आपको बहुत ज्यादा धन की प्राप्ति होगी और आपके सभी दुख दूर हो जाएंगे कहा जाता है कि लक्ष्मी जी की आरती(lakshmi ji ki aarti) करने से व्यक्ति बहुत ज्यादा संपत्ति का मालिक बन जाता है तो आइए आनंद उठाएं लक्ष्मी जी की आरती(lakshmi ji ki aarti) का.......

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लक्ष्मी जी की आरती(lakshmi ji ki aarti)


ओम जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता ।
  तुमको निशदिन सेवत, हर विष्णु विधाता ।।
               ओम जय लक्ष्मी माता

Om Jai Lakshmi Mata,mayya Jay Lakshmi Mata
 tumko nishadin savat, har Vishnu vidhata
              Om Jay Lakshmi Mata
 
    (आप पढ़ रहे हैं लक्ष्मी जी की आरती)

  उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग माता ।
  सूर्य, चंद्रमा, ध्यावत, नारद ऋषि गाता ।।
               ओम जय लक्ष्मी माता

Uma Rama Brahmani, Tum hi Jag Mata Surya chandrama dhyavat, Narad Rishi Gatha. Om Jai Lakshmi Mata

(Aap padh rhe h lakshmi ji ki aarti)

    दुर्गा रूप निरंजनी, सुख संपति दाता ।
 जो कोई तुमको ध्यावत, रिद्धि सिद्धि पाता ।।
               ओम जय लक्ष्मी माता

Durga roop Niranjani, Sukh sampati data. Jo koi tumko Diyaavat, Riddhi Siddhi pata. Om Jay Lakshmi Mata

(आप पढ़ रहे हैं लक्ष्मी जी की आरती)


    तुम पाताल निवासिनी, तुम ही शुभ दाता ।
 कर्म प्रभाव प्रकाशिनी, भव निधि की त्राता ।।
                ओम जय लक्ष्मी माता

Tum Patal nivasini, Tum hi Shubh data. karam prabhav prakashini, Bav Nidhi ki trata.om jay Lakshmi mata

(Aap padh rhe h lakshmi ji ki aarti)


     जिस घर में तुम रहती, तह सब सद्गुण आता ।
       सब असंभव हो जाता, मन नहीं घबराता ।।
                ओम जय लक्ष्मी माता

Jis ghar me tum rehti,sab sadgun aata
Sab sambhav ho jata man nhi gabrata
Om jai lakshmi lakshmi mata

(आप पढ़ रहे हैं लक्ष्मी जी की आरती)

    तुम बिना यज्ञ ना होवे, वस्त्र ना हो पाता ।
     खान-पान का वैभव, सब तुमसे आता ।।
                ओम जय लक्ष्मी माता

Tum bin yagya n hove,vastra n ho pata
Khan pan ka vebhav, sab tumse aata
 Om jai Lakshmi mata

(Aap padh rhe h lakshmi ji ki aarti)


     शुभ गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि जाता ।
     रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता ।।
                ओम जय लक्ष्मी माता

Shubh gun mandir sunder, kshirodadhi jata
Ratna chaturdash tum bin koi nhi pata
Om jai lakshmi mata

(आप पढ़ रहे हैं लक्ष्मी जी की आरती)

     श्री लक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गाता ।
         उर आनंद समाता, पाप उतर जाता ।।
                ओम जय लक्ष्मी माता

Shri lakshmi li ki aarti jo koi nar gata.ur aanand samata pap utrr jata.om jai lakshmi Mata

(Aap padh rhe h lakshmi ji ki aarti)


       ओम जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता ।।
         तुमको निशदिन सेवत, हर विष्णु विधाता ।।
                 ओम जय लक्ष्मी माता

Om jai lakshmi mata, maya jai lakshmi mata.tumko nishdin sevat h,vishnu vidhata om jai lakshmi mata.

(आप पढ़ रहे हैं लक्ष्मी जी की आरती)


2020 में होली कब है। (holi 2020)

Holi 2020
Holi 2020

Holi (dhulandi) : 10th March 2020
Holika Dahan  : 09th March 2020 

 यदि आप holi 2020 ki दिनांक जानना चाहते हैं तो इस पोस्ट को पूरी पढ़िए दोस्तों होली का त्यौहार एक रंगीला त्योहार हैइस दिन सभी मिलजुल कर अपने गिले-शिकवे को बोलते हैं तथा नए सिरे से अपनी जिंदगी की शुरुआत करते हैं होली का त्योहार हिंदुओं का पारंपरिक त्यौहार है। यह है होली का त्यौहार इसमें एक और रंगों के माध्यम से संस्कृति के रंग में रंगकर सारी भिन्नताएं मिट जाती हैं और सब बस एक रंग के हो जाते हैं वहीं दूसरी और धार्मिक रूप से भी होली बहुत महत्वपूर्ण हैं। मान्यता है कि इस दिन स्वयं को ही भगवान मान बैठे हरिण्यकशिपु ने भगवान की भक्ति में लीन हुए अपने ही पुत्र प्रह्लाद को अपनी बहन होलिका के द्वारा जिंदा जलाने की योजना बनाई परंतु भगवान ने भक्त पर अपनी कृपा की और होलीका ही जल कर राख हो गई। इसलिये होलिका दहन की परंपरा भी इस समय पूरी की जाती हैं। । होलिका दहन से अगले दिन रंगों से खेला जाता है इसलिये इसे रंगवाली होली औरधुलंडी भी कहा जाता है।

होली पूजा का महत्व

घर में सुख-शांति, धन वैभव,सुख समृद्धि, संतान प्राप्ति आदि के लिये महिलाएं इस दिन होली की पूजा करती हैं।तथा सभी इस त्यौहार को धूमधाम से मनाते हैं।। होलिका दहन के लिये लगभग एक महीने पहले से तैयारियां शुरु कर दी जाती हैं। कांटेदार झाड़ियों या लकड़ियों तथा चारे को इकट्ठा किया जाता है फिर होली वाले दिन शुभ मुहूर्त में होलिका का दहन किया जाता है।

चौथ माता की कहानी। करवा चौथ की संपूर्ण व्रत कथा

  • चौथ माता की कहानी। करवा चौथ की सम्पूर्ण व्रत कथा


चौथ माता की कहानी।करवा चौथ संपूर्ण व्रत कथाहिंदू मान्यताओं के अनुसार यह पर्व कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है करवा चौथ को करक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है करवाया करक का अर्थ होता है मिट्टी का पात्र इस व्रत में चंद्रमा को अर्घ्य अर्थात जल अर्पण मिट्टी से बने पात्र से ही लिया जाता है इस कारण इस पूजा में करवा का विशेष महत्व होता है पूजा के बाद या तो करवा को अपने घर में संभाल के रखा जाता है या या किसी ब्राह्मण अथवा योग्य महिला को दान में भी देने का विधान है दोस्तों करवा चौथ का व्रत पंजाब राजस्थान उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में विशेष रूप से धूमधाम से मनाया जाता है परंतु इस वैश्वीकरण के युग में एक दूसरे को लेकर अन्य प्रांत के लोग भी इस व्रत को धूमधाम से मनाने लगे हैं करवा चौथ का व्रत केवल सुहागन स्त्रियां ही रखती है सुहागन स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु अपने दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि तथा अखंड सौभाग्य के लिए के लिए करवा चौथ का व्रत रखती है इस व्रत में स्त्रियां पूरे दिन जल ग्रहण किए बिना सुबह से लेकर चंद्र दर्शन तक अन्न व जल का त्याग करती है यानी निर्जला रहती है तथा पूजा के उपरांत ही अन्य तथा जल ग्रहण करती है इस व्रत में रात को चंद्रमा देखने का विधान है इस व्रत में महिलाएं शिवजी पार्वती कार्तिकेय तथा साथ-साथ गणेश जी की भी पूजा करती है उसके बाद चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को अर्घ्य देकर अपना व्रत पूरा करती है तो दोस्तों आइए जानते हैं "चौथ माता की कहानी। करवा चौथ संपूर्ण व्रत कथा"



करवाचौथ व्रत की पूजन विधि



  • जो सौभाग्यवती स्त्रियां इस करक चतुर्थी का व्रत करके सांयकाल विधि से पूजन करेंगे व अचल सौभाग्य धन पुत्र तथा बड़े भारी यश को प्राप्त होंगी करक इस मंत्र को पढ़कर दुग्ध अथवा जल से भरा हुआ कलश लेकर उसमें पंचरत्न डालकर ब्राह्मण को देवें और कहे कि गणेश जी इस करवा के दान से मेरे पति बहुत काल तक जीवित रहे मेरा सौभाग्य बना रहे सुहागिन स्त्रियों को भी देवे और उनसे लेवे भी इस प्रकार से सौभाग्य की इच्छा करने वाली स्त्रियां जो भी इसे करेंगी वह सौभाग्य पुत्र तथा अचल लक्ष्मी को प्राप्त होंगी

चौथ माता की कहानी



मांधाता कहने लगे कि जिस समय अर्जुन निलगिरी पर तप के लिए चले गए तो उनके पीछे द्रौपदी खिन्न होकर चिंता करने लगी कि अर्जुन ने बड़ा कठिन कर्म प्रारंभ कर दिया है किंतु विघ्न डालने वाले शत्रु अनेक है। इस प्रकार चिंता करके श्री कृष्ण जी से सब विघनो के नाश करने का उपाय पूछने लगी। द्रोपदी ने कहा कि है सर्व जगत के नाथ! आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताने की कृपा करें, जिसके करने से सभी विघ्न दूर हो जाएं।

 श्री कृष्ण ने कहा कि हे महाभागे!श्री पार्वती जी ने भगवान शंकर जी से यही प्रश्न किया था, तब श्री शंकर जी ने पार्वती से कहा था हे वराराहे। वही करक चतुर्थी नाम का व्रत मैं तुमसे कहता हूं, तुम ध्यानपूर्वक सुनो, जो सब प्रकार के विघ्नों का नाश करने वाला है।
आप पढ़ रहे है चौथ माता की कहानी
 श्री पार्वती जी ने कहा कि हे भगवन! वह करवा चौथ का व्रत किस प्रकार है तथा उसका विधान क्या है और पहले भी उसे  किसी ने किया है?

शंकर जी बोले कि पार्वती जी अनेक प्रकार के रत्नों से शोभायमान, चांदी और सोने के भवनों से भरे, विद्वान पुरुषों से सुशोभित, लोगों को वश में करने वाली, दिव्य स्त्रियों से शोभायमान, जहां पर सदैव ही वेद ध्वनि होती है- ऐसे स्वर्ग से भी मनोहर, परम रमणीक शुक्रप्रस्थपुर (दिल्ली शहर) में एक वेद शर्मा नामक ज्ञानी ब्राह्मण रहता था, उसकी पत्नी का नाम लीलावती था। उसको महा पराक्रमी 7 पुत्र और संपूर्ण लक्षणों से युक्त वीरवती नाम की एक कन्या उत्पन्न हुई। उसकी आंख नीलकमल के सामान और मुख चंद्रमा के समान था।आप पढ़ रहे है चौथ माता की कहानी  उसके विवाह के योग्य समय आ जाने पर वेद शर्मा ने एक वेद शास्त्र के ज्ञाता विद्वान ब्राह्मण को विवाह विधि से उसे प्रदान कर दिया।

इसके पश्चात वीरवती ने अपने भाइयों की स्त्री (भोझाइयों) समेत गोरी का व्रत किया फिर कार्तिक कृष्ण चतुर्थी (करवा चौथ)के दिन व्रत उपवास कर साय काल में स्नान कर सभी ने भक्तिभाव से वट वृक्ष का चित्र बनाकर उसके नीचे शंकर जी गणेश जी और स्वामी कार्तिकेय के साथ पार्वती जी का चित्र बनाया और ओम नमः शिवाय इस मंत्र से गंध पुष्प और अक्षत आदि से गौरी का पूजन किया।

फिर शिव जी गणेश जी तथा षडानन का अलग-अलग पूजन करती हुई पकवान अक्षत दीपक से युक्त 10 करवा और गेहूं के निशान और गुड़ के बने हुए पकवान तथा और भी अनेक प्रकार के फल आदि भोज्य पदार्थों को अर्पण करके, अर्घ्य देने के लिए चंद्रोदय की प्रतीक्षा करने लगी।

 इसी बीच वह वीरवती वाला भूख प्यास की पीड़ा से मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। तब उसके सब भाई बांधव रुदन करने लगे । फिर वीरवती का मुंह धोकर पंखे से हवा करके उसको ढाढस बंधाने लगे कि अब चंद्रमा उदय होने वाला ही है। उसका भाई चिंता युक्त होकर एक महान वटवृक्ष पर चढ़ गया वहीं के प्रेम से दुखी भाई ने जलती हुई लुकारी लेकर चंद्रमा के उदय होने का बहाना कर दिखाया।

 उसने चंद्रमा का उदय जानकर दुख का त्याग करके विधि विधान से अर्घ्य देकर भोजन कर लिया। इस प्रकार व्रत के दूषित हो जाने के कारण उसका पति मर गया। आप पढ़ रहे है चौथ माता की कहानी  तब वीरवती ने अपने पति को मरा हुआ देखकर पुनः शिवजी का पूजन 1 वर्ष तक निराहार व्रत करके किया। वर्ष के समाप्त होने पर करवा चौथ का व्रत उसके  भाइयों ने किया।

वीरवती ने भी पूर्व विधान से व्रत किया ।जब उस दिन देव कन्याओं के साथ इंद्राणी वहां करक चतुर्थी का व्रत करने के लिए स्वयं स्वर्ग से वीरवती के पास आई तब वीरवती ने इंद्राणी से सब बातें पूछी। वीरवती ने कहा कि मैं करक चतुर्थी का व्रत करके अपने पति के घर आई तो मेरा पति मृत्यु को प्राप्त हो गया, मैं नहीं जानती कि किस पाप के कर्म से मुझको यह फल मिला है।

जय मातेश्वरी हमारे भाग्य से आप यहां आ गई है, सो मेरे भाइयों को जीवित करके मुझ पर कृपा कीजिए। इंद्राणी ने कहा कि सुबह गत वर्ष जो तुमने अपने पति के घर में करक चतुर्थी का व्रत किया था, तो बिना चंद्रमा के उदय हुए ही तुमने अर्घ्य दे दिया था। इसी से व्रत दूषित हो गया और तुम्हारा पति मृत्यु को प्राप्त हो गया ।अब तुम यत्न के साथ इस करवा चौथ का व्रत करो तत्पश्चात इस व्रत के प्रभाव से मैं तुम्हारे पति को जीवित कर दूंगी।

श्री कृष्ण जी कहने लगे कि हे द्रोपदी! इंद्राणी के वचन सुनकर वीरवती ने विधान पूर्वक व्रत किया इस प्रकार उसके करवा चौथ का व्रत करने से इंद्राणी ने प्रसन्न होकर जल के द्वारा अभी सिंचन कर उसके पति को जीवित कर दिया। वह देवता के समान हो गया इसके पश्चात वीरवती अपने पति के साथ घर आकर आनंद करने लगी। वीरवती के व्रत के प्रभाव से उसका पति धन-धान्य पुत्र तथा आयु को प्राप्त हुआ।
आप पढ़ रहे है चौथ माता की कहानी
 इसलिए तुम भी इस व्रत को यत्न पूर्वक करो, सूत जी कहने लगे कि हे इस प्रकार श्री कृष्ण जी के वचनों को सुनकर द्रोपदी ने इस करवा चौथ व्रत को किया जिसके प्रभाव से संग्राम में कौरवों को जीतकर अतुलनीय राज्य को प्राप्त किया ।जिससे उनका सब दुख जाता रहा।


तो ये थी करवा चौथ की सम्पूर्ण "चौथ माता की कहानी। करवा चौथ की संपूर्ण व्रत कथा" जिसके माध्यम से आप अपना व्रतपूरा कर अपने पतिदेव की लम्बी उम्र का आशीर्वाद चौथ माता से प्राप्त कर सकती है. और साथ ही इस कथा को अपनी माता बहनों के साथ  निचे दिए गये किसी भी माध्यम से शेयर करके पुण्य प्राप्त करे